मानवीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किसी का भी रोजगार छीना जाना या उसमें अड़चन पैदा करना उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह भी सही है कि रोजगार भी तभी जरूरी है जब आम आदमी जिंदा रहे। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एमआर शाह तथा न्यायमूर्ति एएन बोपन्ना की दो सदस्यीय पीठ द्वारा बीते 28 सितंबर को पटाखों के संबंध में दिया गया निर्णय अपने आप में प्रदूषण रोकने और पटाखों को लेकर नागरिकों के घायल होने और कई घटनाओं में मरने से रोकने का एक सकारात्मक उपाय कहा जा सकता है। इसलिए रोजगार की आड़ में नागरिकों के जीवन से नहीं खेल सकते। शब्द अपने आप में बड़े सटीक बैठते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि बीते वर्षों मेें हरित पटाखों के उत्पादन ओैर उपयोग की बढ़ावा देने के काफी प्रयास शुरू हुए उसके बावजूद इस व्यवसाय में लगे कुछ लोग आतिशबाजी के निर्माण में कैमिकल और विस्फोटक सामग्री का उपयोग करने से बाज नहीं आते हैं। शायद दीपावली और शब ए बारात तथा अन्य खुशी के मौकों पर उपयोग होने वाली आतिशबाजी के उत्पादन में लगे लोगों के मरने और इनके उत्पादन वाले कारखानों में आग लगने की खबरें भी पढ़़ने को मिलती ही रहती हैं।
और सबसे बड़ी बात तो यह है कि हर वर्ष सरकार के निर्देश पर प्रशासन द्वारा यह आदेश किए जाते हैं कि आवाज वाली आतिशबाजी नहीं बिकेगी। और सुरक्षित स्थानों पर इसकी बिक्री के लिए दुकानें और स्टोर के लिए गोदाम होंगे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह कथन बिल्कुल सही है कि जिला प्रशासन और पुलिस के अफसर आदेश तो खूब करते हैं लेकिन उनका पालन कुछ प्रतिशत को छोड़कर नहीं होता है। क्योंकि गली मौहल्लों से लेकर घने बाजारों में त्योहार से दो तीन दिन पहले आतिशबाजी की बिक्री खूब होती है और घने मोहल्लों में इनके गोदाम बना लिए जाते हैं। हां यह जरूर होता है कि आदेशों का उल्लंघन के नाम पर संबंधित थाने के अफसर की दुकानदारी खूब चल निकलती है। और इसके बारे में सभी को पता होता है क्योंकि अगर प्रतिबंधित पटाखें बड़े लोगों के घरों पर छूट रहे हंै तो कहंीं न कहीं से तो आएं होंगे। प्रतिबंध के बाद भी यह कैसे उपलब्ध रहे यह देखने को कोई तैयार नहंीं होता। मेरा मानना है कि सरकार को कैमिकल और विस्फोटक युक्त आतिशबाजी से लोगों की जानमाल की रक्षा के लिए आदेश करना चाहिए कि ग्रीन पटाखों के अलावा किसी भी प्रकार की आतिशबाजी का निर्माण नहीं होगा और इसके लिए निर्माण करने वाली फैक्टियों की पूरी निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए। और अगर फिर भी आदेशों का उल्लंघन कर किसी थाना क्षेत्र में आतिशबाजी बिकती नजर आए तो थानेदार और अन्य जिम्मेदारों के खिलाफ दुकानदार के साथ सख्त कार्रवाई की जाए तभी हरित पटाखों की बिक्री शुरू और कैमिकल युक्त विस्फोटक की बिक्री बंद हो सकती है।
एक खबर के अनुसार प्रतिबंध के बावजूद आतिशबाजी होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए गत मंगलवार को कहा कि जिन लोगों के कंधों पर इस आदेश का पालन कराने की जिम्मेदारी है, वही इसका उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही, शीर्ष अदालत ने कहा कि वह पटाखों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करते समय कुछ लोगों के रोजगार की आड़ में अन्य नागरिकों के जीवन का अधिकार नहीं छीन सकते।
जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा, प्रतिबंध के बावजूद शादी समारोह, धार्मिक आयोजन आदि में पटाखे चलाए जाते हैं। चुनाव जीतने पर भी आतिशबाजी कर खुशी का इजहार किया जाता है। इन्हें रोकने के लिए कानून मौजूद है, लेकिन उन्हें लागू भी करना है। जिनके पास अदालती आदेशों का पालन कराने की जिम्मेदारी होती है, वे खुद ही इसका उल्लंघन करते हैं। हमारे आदेशों का हर हाल में सच्ची भावना के साथ पालन होना चाहिए। पीठ ने कहा कि हमारा मुख्य फोकस निर्दोष नागरिकों को जीवन जीने का अधिकार कायम रखने पर है। यदि हम पाएंगे कि ग्रीन पटाखे मौजूद हैं और विशेषज्ञों की समिति उन्हें मंजूरी देती है तो हम उचित आदेश पारित कर सकते हैं।
इससे पहले सुनवाई के दौरान पटाखों के निर्माता संघ की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एएनएस नाडकर्णी ने कहा कि दिवाली चार नवंबर को है और वे चाहते हैं कि पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पेसो) पटाखों को लेकर एक निर्णय ले। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मामले पर फैसला करना चाहिए, क्योंकि पटाखा उद्योग में लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। नाडकर्णी ने कहा कि जिन लोगों ने आदेश का पालन नहीं किया है, उनके खिलाफ अवमानना के मामले को सुना जाना चाहिए। लेकिन इस उद्योग से जुड़े लाखों लोगों की स्थिति पर भी गौर किया जाना जरूरी है।
वहीं याचिकाकर्ता अर्जुन गोपाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि शीर्ष अदालत 2015 से अब तक कई निर्देश दे चुकी है, जिनमें कहा गया है कि पेसो सुरक्षित पाए जाने वाले पटाखों को ही अंतिम तौर पर मंजूरी देगा। लेकिन सरकार बेरियम नाइट्रेट से प्रतिबंध हटाने के लिए पेसो की अनदेखी कर रही है। अदालती आदेशों का उल्लंघन हो रहा है। ई-काॅमर्स के जरिये पटाखे घरों तक पहुंचाएं जा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने इससे पहले पटाखों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार किया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि केवल लाइसेंसधारक विक्रेताओं के जरिये ग्रीन पटाखे ही बेचे जा सकते हैं। साथ ही अदालत ने पटाखों की आॅनलाइन बिक्री को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था। अदालत में बहस के दौरान नाडकर्णी की तरफ से दलील दे रहे शंकरनारायण को रोकने पर पीठ ने मजाक में कहा, हम नहीं चाहते कि अदालत कक्ष के अंदर कोई पटाखा फूटे। हर किसी को बात कहने का मौका मिलेगा। हम भी पटाखों से डरता हूं। इस पर शंकरनारायण ने कहा, मीलाॅर्ड, हम यकीन दिलाते हैं कि अदालत में कोई पटाखा नहीं फूटेगा, केवल काम होगा।
सरकार ने कहा- विशेषज्ञों ने दिए हैं ग्रीन पटाखे पर सुझाव
केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय की तरफ से पेश एडिशनल साॅलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ से कहा कि मंत्रालय ने अक्टूबर 2020 में एक हलफनामा दायर किया था। यदि अदालत उसका संज्ञान लेती है तो उसमें सभी अंतरिम आवेदनों में कही गई बातें शामिल की गई हैं। भाटी ने कहा, सभी विशेषज्ञों ने एकमत होकर ग्रीन पटाखों के नियमन पर सुझाव दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमें रोजगार, बेरोजगारी और नागरिक के जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा। कुछ लोगों के रोजगार की आड़ में हम अन्य नागरिकों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दे सकते।
इस संदर्भ मेें कोर्ट द्वारा पटाखा निर्माता कंपनिया स्टैंडर्ड फायर वक्र्स,हिंदुस्तान फायर वक्र्स, विनायक फायर वक्र्स, मरयम्मा फायर वक्र्स को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए हैं।
– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com