वैसे तो अपने समाज में आदिकाल से महिलाओं का पूरे परिवार पर पूर्ण अधिकार रहा है। और उनकी वीरता तथा काबिलियत और महिला उत्थान के लिए किए गए कार्यों के किस्से आज भी बच्चों को पढ़ाए और सुनाए जाते हैं। इनमें झांसी की रानी, अहिल्याबाई होल्कर आदि के नाम और काम को देखा जा सकता है। आधुनिक समाज जैसे जैसे प्रगति की ओर बढ़ रहा है। मातृशक्ति महिलाओं में भी जागृति आ रही है। परिणामस्वरूप दुनिया का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है। जहां जनसंख्या की आधी आबादी के लगभग उपस्थित माता बहनों का प्रभाव नजर ना आता हो। वो बात दूसरी है कि हमेशा महिला शक्ति को बढ़ावा देने और उनके उत्थान की बात करने वाले हमारे राजनेता अभी तक सर्वगुण संपन्न महिला शक्ति की ताकत को पहचान नहीं पा रहे हैं वरना हर क्षेत्र में अब तक उन्हें बराबर का प्रतिनिधित्व दिया जा चुका होता। मेरा मानना है कि महिलाओं को हर क्षेत्र में उनकी कार्यकुशलता और मंझे जुए मैनेजमेंट की कला को देखते हुए बराबर की भागीदारी करने में देर अब नहीं करनी चाहिए। गांव शहर में जो स्थानीय निकायों आदि में चुनी गई महिलाआंें के पति दखलअंदाजी की कोशिश करते हैं उस पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
अब मुझे लगता है कि दुनिया की आधी आबादी बच्चों का पालन पोषण कर सही प्रकार से परिवार को चलाने और सबको सदमार्ग दिखाने वाली हमारी महिलाओं के द्वारा अभी तक भले ही प्रभावी रूप से जितनी जिसकी भागीदारी उतनी उसकी हिस्सेदारी के सिद्धांत को ध्यान में रख बराबर के अधिकार न मांगे जा रहे हो लेकिन देश के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना साहब द्वारा बीती 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों के लिए आयोजित सम्मान समारोह में जो कहा गया कि न्यायपालिका में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण का हक है यह मांग नहीं उनका अधिकार है। इनसे संबंध खबरों के अनुसार उनका आहवान है कि दुनियाभर की महिलाओं एक हो जाओ। न्यायपालिका के सबसे उच्च पद पर विराजमान महानुभव द्वारा जब यह आहवान कर ही दिया गया है तो मुझे लगता है कि सरकार को भी इसे मानने में देर नहीं करनी चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि संविधान मेें दिए गए अधिकारों में इससे संबंध किसी लाइन को लेकर मातृशक्ति न्यायालय का द्वार खटखटाकर बराबर का अधिकार मांगे या इसके लिए सड़कों पर उतरकर अपने हकों की लड़ाई लड़े इससे पूर्व ही उन्हें हर क्षेत्र में बराबर का अधिकार देने की घोषणा समय से पूर्व कर देनी चाहिए। मैं समझता हूंु कि इसमें कोई बुराई भी नहीं है। क्योंकि घर की महिलाएं आगे बढ़ेंगे। समाज को सही दिशा देंगी इसलिए पुरूष भी इसके विरोध में शायद अपनी आवाज बुलंद नहीं करेंगे।
देश की न्यायपालिका में बड़े बदलाव के प्रयासों में जुटे सीजेआई एनवी रमण रविवार को महिला वकीलों के समर्थन में खुलकर सामने आए। उन्होंने महिला वकीलों से आह्वान किया कि वे न्यायपालिका में 50 फीसदी आरक्षण की अपनी मांग को जोरदार ढंग से उठाएं। सीजेआई ने यह भी आश्वस्त किया कि उन्हें उनका पूरा समर्थन है।
सुप्रीम कोर्ट में नौ नवनियुक्त न्यायाधीशों के शीर्ष कोर्ट की महिला वकीलों द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में सीजेआई ने यह अहम बात कही। सीजेआई रमण ने कहा, मैं नहीं चाहता कि आप रोएं, लेकिन आप गुस्से से चिल्लाएं और मांग करें कि हम 50 फीसदी आरक्षण चाहते हैं। सीजेआई ने कहा कि यह हजारों सालों से महिलाओं के दमन का मामला है और महिलाएं आरक्षण की हकदार हैं।
चीफ जस्टिस ने कहा, श्यह अधिकार का मामला है, दया का नहीं। मैं देश के लॉ स्कूलों में महिलाओं के लिए निश्चित मात्रा में आरक्षण की मांग का भी समर्थन करता हूं, ताकि वे न्यायपालिका में आ सकें। हाल ही में जिन नौ जजों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया है, उनमें तीन महिला जज शामिल हैं। सीजेआई रमण ने कहा कि उन्होंने कार्ल माक्र्स के नारे दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है, में संशोधन किया है। इस मौके पर वह कहना चाहते हैं कि दुनिया की महिलाएं एकजुट हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है। यही समय है जब हमें न्यायपालिका में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण की मांग करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह दुखद है कि कुछ चीजें बहुत देरी से महसूस की गईं, लेकिन वह बहुत खुश होंगे, जब यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा। जस्टिस रणम ने कहा, मेरी सभी बहनों और आप सभी ने समाज के लोगों और महिलाओं के लिए अपवाद पेश किया है। चाहे युवा पुरुष हों या महिलाएं आपको रोल माॅडल के रूप में देख रहे हैं। आपकी सफलता की कहानियां उन्हें प्रेरित करेंगी और हम उम्मीद करते हैं कि अधिक महिलाएं इस पेशे में शामिल होंगी और हम जल्द ही 50 प्रतिशत के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। मैं आपके द्वारा की गई सभी पहलों का हृदय से समर्थन करता हूं और जब तक मैं यहां हूं, मैं आपकी पहल का समर्थन करूंगा। सीजेआई ने कहा कि बीती रात ओडिशा से लौटने के बाद मैंने न्यायिक तंत्र के बारे में कुछ सूचनाएं संकलित कीं। पूरे देश व अधीनस्थ न्यायालयों में 30 फीसदी से भी कम महिलाएं हैं। हाईकोर्टों में महिला जजों की संख्या 11.5 फीसदी हैै और सुप्रीम कोर्ट के 33 जजों में चार महिलाएं हैं, यह करीब 11 या 2 फीसदी होता है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के 17 लाख वकीलों में से सिर्फ 15 फीसदी महिलाएं हैं और राज्यों की बार काउंसिलों में सिर्फ 2 फीसदी महिला प्रतिनिधि हैं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस पी एस नरसिम्हा ने कहा कि भारत को औपनिवेशिक युग के कानूनों और उनकी व्याख्या के कारण 70 साल से अधिक समय तक नुकसान उठाना पड़ा। इन कानूनों को उपनिवेशवाद से मुक्त करना जजों का संवैधानिक मिशन है। जस्टिस नरसिम्हा 2027 में देश के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति बी वी नागरत्न से पदभार ग्रहण करना उनके लिए एक बड़ा सम्मान होगा, जो भारत की पहली महिला सीजेआई बनेंगी। इसी कार्यक्रम में जस्टिस बी वी नागरत्न ने कहा कि न्यायपालिका में महिला जजों के उच्च पदों पर आने से लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। इससे महिलाओं व पुरुषों की भूमिका को लेकर दृष्टिकोण भी बदलेगा और लैंगिक रूढ़िवादिता खत्म होगी। जस्टिस नागरत्न 2027 में देश की पहली महिला सीजेआई बनने वाली हैं। मुख्य न्यायाधीश के आहवान के बाद मुझे लगता है कि परिवार रूपी गाड़ी के दो पहियों में से एक महिलाओं को उनके अधिकार और सम्मान मिलने से परिवारों में खुशहाली और स्वालंबन की स्थिति पैदा होगी जो सबके लिए कुछ ना कुछ अच्छा ही करने में सक्षम होंगी।
– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com